शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

मूर्तिया


कौन कहता है की
मुगलिया खानदान के वारिस नहीं बचे
हम है असली वारिस उस
मुगलिया परंपरा के
जिसमें असुरक्षित सम्राट
अपना मकबरा खुद ही बनवा देता था
उसे मालूम था
उसके उत्तराधिकारी उसे अच्छी
कब्र भी नहीं नसीब होने  देंगे
उसी परंपरा पर चलते हुए
मैंने अपनी मूर्तिया  बनवाई है
क्यूंकि मुह्जे मालूम है की
कल के इतिहास मैं मेरी
जगह क्या होगी
मूर्तिया  गद्वाकर मैंने
अपना नाम तो सुरक्षित कर ही लिया है
क्यूंकि मुह्जे मालूम है
इस देश में मुर्तिभंज़क  नहीं है
अत: मेरी मूर्तिया  और
मेरा नाम सुरक्षित रहेगा
आखिर अम्रतः की चाह
किसे नहीं होती
इन मूर्तिया से मैं तो अमर रहूंगी
भले कल उन पर चिड़िया बिट करे
या आवारा कुत्ते उसके पास घुमे




2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके सोच को सलाम करता हू! बहोत ही गहराई तक गोटा लगाने के बाद आप जो मोती बाहर लेट है, उसको पढ़ कर बहोत जी अद्भुत अनुभव लगता है!

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