कौन कहता है की
मुगलिया खानदान के वारिस नहीं बचे
हम है असली वारिस उस
मुगलिया परंपरा के
जिसमें असुरक्षित सम्राट
अपना मकबरा खुद ही बनवा देता था
उसे मालूम था
उसके उत्तराधिकारी उसे अच्छी
कब्र भी नहीं नसीब होने देंगे
उसी परंपरा पर चलते हुए
मैंने अपनी मूर्तिया बनवाई है
क्यूंकि मुह्जे मालूम है की
कल के इतिहास मैं मेरी
जगह क्या होगी
मूर्तिया गद्वाकर मैंने
अपना नाम तो सुरक्षित कर ही लिया है
क्यूंकि मुह्जे मालूम है
इस देश में मुर्तिभंज़क नहीं है
अत: मेरी मूर्तिया और
मेरा नाम सुरक्षित रहेगा
आखिर अम्रतः की चाह
किसे नहीं होती
इन मूर्तिया से मैं तो अमर रहूंगी
भले कल उन पर चिड़िया बिट करे
या आवारा कुत्ते उसके पास घुमे